अब ग्रामीण व दुर्गम क्षेत्रों में भी शुरू होंगी ब्रॉडबैंड सेवाएं

Edited By Kuldeep, Updated: 01 Jun, 2022 10:46 PM

mandi rural broadband services started

अब ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में भी ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू होंगी। यह को-ऑप्रेटिव स्पैक्ट्रम सैंसिंग तकनीक की मदद से संभव हो सकेगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) मंडी के शोधकर्ताओं ने वायरलैस संचार के उपयोगों में स्पैक्ट्रम की कमी को दूर...

मंडी (रजनीश): अब ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में भी ब्रॉडबैंड सेवाएं शुरू होंगी। यह को-ऑप्रेटिव स्पैक्ट्रम सैंसिंग तकनीक की मदद से संभव हो सकेगा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) मंडी के शोधकर्ताओं ने वायरलैस संचार के उपयोगों में स्पैक्ट्रम की कमी को दूर करने के लिए प्रौद्योगिकी विकसित की है। इस तकनीक की मदद से 5जी और 6जी वायरलैस संचार की भावी प्रौद्योगिकियों में स्पैक्ट्रल क्षमता बढ़ाएगी। इसके अलावा यह तकनीक वायरलैस संचार के भावी उपयोगों में डाटा संचार की बढ़ती मांग पूरी करने के लिए रेडियो फ्रीक्वैंसी स्पैक्ट्रम द्वारा उपयोग की क्षमता को बढ़ाएगी। यह तकनीक आई.आई.टी. मंडी के कम्प्यूटिंग एवं इलैक्ट्रीकल इंजीनियरिंग स्कूल के सहायक प्रोफैसर डा. राहुल श्रेष्ठ और पीएच.डी. विद्वान रोहित बी. चौरसिया द्वारा विकसित की गई है। इस तकनीक में कई कनैक्टिड डिवाइस बिना ब्रेक संचार के लिए स्पैक्ट्रम होल का उपयोग कर सकते हैं।

क्या है रेडियो फ्रीक्वैंसी
रेडियो फ्रीक्वैंसी तरंगें या दूरसंचार क्षेत्र में प्रचलित स्पैक्ट्रम कम ऊर्जा की विकिरण हैं, जिनका उपयोग वायरलैस संचार में किया जाता है। वायरलैस रेडियो फ्रीक्वैंसी स्पैक्ट्रम एक सीमित संसाधन है। सरकारें दूरसंचार कंपनियों को इसका आबंटन लाइसैंस के माध्यम से करती हैं। हाल के वर्षों में वायरलैस संचार प्रौद्योगिकी में तेजी से वृद्धि हुई है और आने वाले समय में 5वीं जैनरेशन के नए रेडियो (5जी-एनआर) और इंटरनैट ऑफ ङ्क्षथग्स (आई.ओ.टी.) जैसी प्रौद्योगिकियों को व्यापक रूप से अपनाए जाने के कारण इसमें कई गुना वृद्धि का अनुमान है।

आई.आई.टी. मंडी सहायक प्रोफैसर डा. राहुल श्रेष्ठ ने कहा कि एस.यू. के डिवाइस में लगे स्पैक्ट्रम होल का पता लगाने वाले इस सैंसर को स्टैंड अलोन स्पैक्ट्रम सैंसर (एस.एस.एस.आर.) कहते हैं। स्टैंड अलोन स्पैक्ट्रम सैंसर (एस.एस.एस.आर.) में पहचान करने की क्षमता अक्सर संतोषजनक नहीं होती है। इसकी वजह हिडेन नोड और सिग्नल टू नॉयस रेशियो (एस.एन.आर.) वाल जैसी समस्याएं हैं। इसलिए जब रियल टाइम में एस.एस.एस.आर. का उपयोग किया जाता है तो कार्य प्रदर्शन में विश्वसनीयता नहीं होती है। टीम के शोध ने इस समस्या को दूर करने का प्रयास किया है। यह शोध कार्य ऐसी तकनीक पर केंद्रित है, जिसमें एस.यू. के वायरलैस डिवाइस में एस.एस.एस.आर. नहीं लगा है, बल्कि स्पैक्ट्रम बैंड से प्राप्त पाटर््स को डाटा फ्यूजन सैंटर (डी.एफ.सी.) भेजा जाता है। इसके बाद डी.एफ.सी. इन पाटर््स को डिजिटाइज करता है और फिर डिवाइस लेवल एस.एस.एस.आर. उपयोग करने की बजाय सिंगल को-ऑप्रेटिवस्पैक्ट्रम सैंसर (सी.एस.आर.) से प्रोसैस करता है।

रिसर्च स्कॉलर, आई.आई.टी. मंडी  रोहित बी. चौरसिया ने कहा कि को-ऑप्रेटिव स्पैक्ट्रम सैंसिंग के लिए लागू करने में आसान एल्गोरिदम पेश किया है। इसमें कम्प्यूटेशन की जटिलता कम है और फिर सी.एस.आर. और उनके सब मॉड्यूल्स के लिए कई नए हार्डवेयर आर्किटैक्चर भी विकसित किए गए हैं। आई.आई.टी. मंडी द्वारा विकसित डिजिटल सी.एस.आर. ए.एस.आई.सी. चिप वास्तविक चैनल परिदृश्यों में पी.यू. को उत्कृष्ट डिटैक्शन की विश्वसनीयता के साथ हार्डवेयर की बेहतरीन क्षमता और कम से कम समय में सैंसिंग की क्षमता भी देगा। स्पैक्ट्रम जो उपयोग में नहीं होगा, उसे प्राप्त करने के लिए सी.एस.आर. चिप का उपयोग किसी भी मोबाइल वायरलैस संचार उपकरण से किया जा सकता है। इसका खासकर आने वाले समय में 5जी और 6जी वायरलैस संचार प्रौद्योगिकियों में स्पैक्ट्रम की क्षमता बढ़ाने में बहुत लाभ होगा। इसके अतिरिक्त यह आई.ओ.टी. आधारित नैटवर्क व्यापक रूप से लागू करने में सक्षम बनेगा।

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