Edited By Jyoti M, Updated: 20 Feb, 2026 12:16 PM

एक समय था जब बच्चे मैदानों में दौड़ते-भागते नजर आते थे, लेकिन अब उनकी दुनिया मोबाइल स्क्रीन तक सिमटती जा रही है। गेम, रील्स, एनिमेटेड वीडियो और ऑनलाइन पढ़ाई के बढ़ते इस्तेमाल ने नौनिहालों की आंखों पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है।
हिमाचल डेस्क। एक समय था जब बच्चे मैदानों में दौड़ते-भागते नजर आते थे, लेकिन अब उनकी दुनिया मोबाइल स्क्रीन तक सिमटती जा रही है। गेम, रील्स, एनिमेटेड वीडियो और ऑनलाइन पढ़ाई के बढ़ते इस्तेमाल ने नौनिहालों की आंखों पर गंभीर असर डालना शुरू कर दिया है। डॉक्टरों के अनुसार अब ऐसी स्थिति बन रही है कि स्कूल की पढ़ाई शुरू होने से पहले ही छोटे-छोटे बच्चों को आंखों की जांच और इलाज की जरूरत पड़ रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरणों का लगातार उपयोग बच्चों की आंखों पर दबाव बढ़ा रहा है। अस्पतालों की ओपीडी में पहले की तुलना में कम उम्र के बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो धुंधला दिखने, आंखों में जलन या सिरदर्द जैसी समस्याओं की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं। चिकित्सकों का मानना है कि स्कूल शुरू होने से पहले बच्चों की आंखों की जांच करवाना बेहद जरूरी हो गया है, ताकि समय रहते समस्या का पता लगाया जा सके।
डॉक्टर बताते हैं कि यदि जांच में नजर कमजोर पाई जाती है तो समय पर नंबर का चश्मा लगाने से स्थिति सुधर सकती है। बच्चों की बढ़ती उम्र और शारीरिक विकास के साथ कई मामलों में आंखों की क्षमता बेहतर होने की संभावना भी रहती है, जिससे भविष्य में चश्मा हटना भी संभव है। शिमला के दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल और आईजीएमसी में रोजाना कई छोटे बच्चे आंखों की जांच के लिए पहुंच रहे हैं, जो बढ़ती समस्या की ओर संकेत करता है।
बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करवाना अब अभिभावकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। ऑनलाइन पढ़ाई, डिजिटल मनोरंजन और मोबाइल पर निर्भरता ने बच्चों की दिनचर्या बदल दी है। इसके साथ ही खान-पान की खराब आदतें भी आंखों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। हरी सब्जियों और पौष्टिक आहार की जगह जंक फूड का बढ़ता चलन भी नजर कमजोर होने का एक कारण माना जा रहा है।
नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार लंबे समय तक स्क्रीन देखने से आंखों में सूखापन बढ़ता है। गैजेट्स से निकलने वाली तेज रोशनी, लगातार नजदीक से देखने की आदत और आंखों को पर्याप्त आराम न मिलना बच्चों की दृष्टि पर सीधा असर डालता है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों की नियमित आंखों की जांच करवानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर डॉक्टर की सलाह से चश्मा या ब्लू-लाइट सुरक्षा वाले लेंस का उपयोग करवाना चाहिए।
डॉक्टरों की सलाह है कि बच्चों को रोजाना आउटडोर खेलों के लिए प्रोत्साहित किया जाए, स्क्रीन टाइम सीमित रखा जाए और संतुलित आहार दिया जाए। समय रहते सावधानी बरतने से न केवल आंखों की रोशनी बचाई जा सकती है, बल्कि बच्चों का स्वस्थ विकास भी सुनिश्चित किया जा सकता है।