खाली हाथों से उबलते हुए बर्तन को अपनी ओर खींचते हैं महिला-पुरुष...फिर भी नहीं आती आंच; अनूठा है किन्नौर का 'खेचांग कायांग' उत्सव

Edited By Swati Sharma, Updated: 14 Feb, 2026 05:23 PM

khechang kayang festival in kinnaur

Kinnaur News: हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के बारंग गांव में सदियों पुरानी और हैरतअंगेज परंपरा 'खेचांग कायांग' उत्सव शुक्रवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस उत्सव की सबसे अनूठी बात यह है कि इसमें ग्रामीण उबलते हुए बर्तन को नंगे...

Kinnaur News: हिमाचल प्रदेश के जनजातीय जिला किन्नौर के बारंग गांव में सदियों पुरानी और हैरतअंगेज परंपरा 'खेचांग कायांग' उत्सव शुक्रवार को श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। इस उत्सव की सबसे अनूठी बात यह है कि इसमें ग्रामीण उबलते हुए बर्तन को नंगे हाथों से अपनी ओर खींचते हैं, जिसे देखकर हर कोई दांतों तले उंगली दबा लेता है।

आस्था की अग्नि: न जलने का है अटूट विश्वास

पर्व के समापन पर गांव के 'संतांग' (देवता के प्रांगण) में एक विशेष आयोजन किया गया। यहां महिलाओं और पुरुषों के माथे पर पहले काला टीका लगाया गया, जिसके बाद शुरू हुआ 'खल' के गर्म बर्तन की खींचातानी का सिलसिला। जलते चूल्हे पर रखे इस बेहद गर्म बर्तन को पुरुष और महिला समूह बिना किसी दस्ताने या कपड़े के, खाली हाथों से एक-दूसरे की ओर खींचते हैं। स्थानीय लोगों की अटूट मान्यता है कि कुलदेवता के आशीर्वाद से आज तक इस प्रक्रिया में किसी भी व्यक्ति का हाथ नहीं जला है। यह मुकाबला तब तक चलता है जब तक गर्म बर्तन पूरी तरह पलट नहीं जाता।

देवता सुनाते हैं सालभर का भविष्यफल

इस ऐतिहासिक मेले का एक कड़ा नियम यह भी है कि गांव के हर परिवार से कम से कम एक सदस्य का शामिल होना अनिवार्य है। यदि कोई परिवार इस परंपरा का पालन नहीं करता, तो उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता है। पर्व के पहले दिन स्थानीय देवता गिरी राजस और माता देवी ग्रामीणों को आगामी एक वर्ष का 'फलादेश' (भविष्यफल) सुनाते हैं। यहां की एक दिलचस्प परंपरा यह है कि यदि देवता का भविष्यफल गलत साबित होता है, तो स्वयं देवता गिरी राजस जी स्वर्ग प्रवास से लौटकर हुए खर्च का हर्जाना भरते हैं और फिर वापस लौट जाते हैं।

क्या है इस पर्व का इतिहास?

स्थानीय किंवदंतियों के अनुसार, सदियों पहले उत्तर गिरी को थामने के लिए देवता गिरी राजस ने अदम्य साहस का परिचय दिया था। उनके इसी पराक्रम की स्मृति में यह अतिरिक्त पर्व (खेचांग कायांग) फागुन माह के पहले दिन से मनाया जाता है।

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