गुरियाल विट में 'खैर' का खेल: ब्लॉक अधिकारी और फॉरेस्ट गार्ड पर उठे सवाल, निगरानी में लापरवाही या कुछ और?

Edited By Jyoti M, Updated: 16 Mar, 2026 11:04 AM

the  khair  game in guriyal vit

नूरपुर वन मंडल के तहत ज्वाली रेंज की गुरियाल विट में वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। क्षेत्र में खैर के पेड़ों को जड़ से उखाड़ने, बिना अनुमति लकड़ी को मौके से उठाने और ठेकेदार के डंप पर बिना संपत्ति मार्क के...

रैहन, (दुर्गेश कटोच)। नूरपुर वन मंडल के तहत ज्वाली रेंज की गुरियाल विट में वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। क्षेत्र में खैर के पेड़ों को जड़ से उखाड़ने, बिना अनुमति लकड़ी को मौके से उठाने और ठेकेदार के डंप पर बिना संपत्ति मार्क के लकड़ी मिलने का मामला सामने आने के बाद विभागीय अधिकारियों की भूमिका पर भी गहरा संदेह पैदा हो गया है।

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार गुरियाल विट के एक क्षेत्र में खैर के कई पेड़ों को जड़ से उखाड़ दिया गया। सूचना मिलने पर 14 मार्च दिन शनिवार को जब हमारी टीम मौके पर पहुंची तो देखा गया कि एक गाड़ी में खैर के मोछो को लोड किया जा रहा था। जब इस बारे उस समय वहां पर मौजूद ठेकेदार के मुंशी से पूछा गया तो उसने साफ तौर पर कहा कि वन रक्षक (फॉरेस्ट गार्ड) के कहने पर ही यह लकड़ी यहां से उठाकर रैहन ले जाई जा रही है।

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सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मौके पर लकड़ी को उठाने या डंप करने की कोई लिखित अनुमति मौजूद नहीं थी। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर फॉरेस्ट गार्ड ने किस अधिकार से लकड़ी को मौके से उठाने के निर्देश दिए।

मीडिया द्वारा सूचना दिए जाने के बाद रैहन ब्लॉक से ब्लॉक अधिकारी जीवन भी मौके पर पहुंचे और गाड़ी में लोड लकड़ी तथा उस स्थान का निरीक्षण किया जहां से पेड़ों को उखाड़ा गया था। जांच के दौरान यह सामने आया कि पेड़ मलकियत भूमि से उखाड़े गए थे। लेकिन इसके बावजूद यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि बिना किसी वैध अनुमति के इन पेड़ों को गाड़ी में लोड कर कहां भेजा जा रहा था।

सबसे अधिक संदेह तब गहरा गया जब  सूत्रों के आधार पर मिली जानकारी के आधार पर मौके पर फॉरेस्ट गार्ड से जड़ से उखाड़े गए पेड़ों के बारे में पूछा गया। शुरुआत में उनके पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं था। बाद में उन्होंने कहा कि इन पेड़ों की डैमेज रिपोर्ट काटी गई है। जब उनसे पूछा गया कि उखाड़े गए पेड़ों को कहां रखा गया है तो उन्होंने बताया कि उन्हें ठेकेदार के डंप स्थल पर रखा गया है।

इसके बाद जब ठेकेदार के डंप स्थल का निरीक्षण किया गया तो वहां की स्थिति और भी चौंकाने वाली थी। डंप पर रखी खैर की लकड़ी और हार्ट वुड पर कोई भी संपत्ति मार्क नहीं पाया गया, जबकि नियमों के अनुसार बिना संपत्ति मार्क के खैर वुड और हार्टवुड को डंप पर रखना पूरी तरह नियमों के खिलाफ है।

इतना ही नहीं, मौके पर मौजूद लकड़ी और उखाड़े गए पेड़ों की संख्या देखकर यह भी संकेत मिले कि जितने पेड़ों को उखाड़ने की अनुमति दी गई थी, उससे कहीं अधिक पेड़ जड़ से उखाड़े गए हैं। यह स्थिति सीधे तौर पर अवैध कटान या विभागीय मिलीभगत की आशंका को जन्म देती है।

हैरानी की बात यह भी है कि अगले दिन 15 मार्च दिन रविवार को  ब्लॉक अधिकारी रैहन जीवन से ठेकेदार के डंप पर किये निरीक्षण के बारे अनियमियताये मिलने पर क्या कार्यवाही की गई पूछा गया इस बारे पूछा गया तो उन्होंने फोन पर जानकारी देते हुए बताया कि डंप पर 3 पेड़ ज्यादा जड़ से उखाड़े गये पाये गये और इस पर डैमेज रिपोर्ट काटी जाएगी। जबकी रिपोर्टर द्वारा डंप पर 30 से अधिक खैर के पेड़ जड़ से उखड़े हुए पाये गये थे। ऐसे में ब्लॉक अधिकारी द्वारा दी जा रही जानकारी और मौके की वास्तविक स्थिति में भारी अंतर होने से उनकी कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठने लगे हैं।

पूरे घटनाक्रम में फॉरेस्ट गार्ड की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। वन रक्षक की मुख्य जिम्मेदारी क्षेत्र की निगरानी करना, अवैध कटान को रोकना और वन संपदा की सुरक्षा सुनिश्चित करना होती है। लेकिन इस मामले में जिस तरह से बिना अनुमति लकड़ी उठाने के निर्देश दिए गए और बिना संपत्ति मार्क की लकड़ी डंप पर पाई गई, उससे विभागीय कार्यप्रणाली पर बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले भी नूरपुर वन मंडल की अलग-अलग वीटों में अवैध कटान के कई मामले सामने आ चुके हैं। ऐसे में ज्वाली रेंज की गुरियाल विट से फिर इस तरह की अनियमितता सामने आना वन विभाग की निगरानी व्यवस्था और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

मामले को लेकर 14 मार्च को  वन मंडल अधिकारी संदीप कोहली से फोन के माध्यम से संपर्क करने की कोशिश की गई थी, लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया था। ऐसे में इस पूरे मामले पर वन मण्डल अधिकारी की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आ सकी। अब बड़ा सवाल यह है कि क्या वन विभाग इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच करेगा या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही दब कर रह जाएगा। यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो यह मामला न केवल वन संपदा की सुरक्षा बल्कि विभागीय जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी बड़ा सवाल बन सकता है।

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