Edited By Vijay, Updated: 29 Aug, 2026 07:47 PM

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल सांगला में एक प्राकृतिक झील बड़े खतरे का कारण बन गई है। सांगला के देबार कंडा में स्थित यारपाबंग झील का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जिससे क्षेत्र में भारी बाढ़ और भूस्खलन की आशंका पैदा हो गई है।
रिकांगपिओ (राजकुमार): हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले के प्रमुख पर्यटन स्थल सांगला में एक प्राकृतिक झील बड़े खतरे का कारण बन गई है। सांगला के देबार कंडा में स्थित यारपाबंग झील का दायरा लगातार बढ़ रहा है, जिससे क्षेत्र में भारी बाढ़ और भूस्खलन की आशंका पैदा हो गई है। इस आसन्न खतरे को देखते हुए शनिवार को सांगला पंचायत के प्रधान प्रविंद्र नेगी की अगुवाई में एक प्रतिनिधिमंडल ने उपायुक्त किन्नौर डॉ. अमित कुमार शर्मा को ज्ञापन सौंपा। पंचायत ने प्रशासन से स्थिति का जायजा लेने और जल्द से जल्द अर्ली वॉर्निंग सिस्टम लगाने की गुहार लगाई है।
2024 के बाद नहीं हुआ कोई काम, नेपाल त्रासदी से बढ़ा खौफ
पंचायत प्रधान प्रविंद्र नेगी ने बताया कि साल 2024 में सेना, आईटीबीपी, सीटीओसी, जिला प्रशासन और भू-वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने इस झील का निरीक्षण किया था। उस समय झील की लंबाई 550 मीटर, चौड़ाई 260 मीटर और गहराई 28 मीटर मापी गई थी। टीम ने पानी और ग्लेशियर के सैंपल भी लिए थे, लेकिन खेद का विषय है कि उस निरीक्षण के बाद से सुरक्षा के लिहाज से आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ के बाद से सांगला घाटी के लोग दहशत में हैं। लोगों को डर है कि अगर भूकंप या ग्लेशियर पिघलने से यह प्राकृतिक झील टूटती है तो बास्पा और सतलुज नदी में भयंकर तबाही आ सकती है।
18 किलोमीटर के दायरे और 2 बड़े पावर प्रोजैक्ट्स पर भारी खतरा
यदि यह प्राकृतिक झील टूटती है तो सांगला से लेकर कड़छम तक करीब 18 किलोमीटर का दायरा पूरी तरह तबाह हो सकता है। बाढ़ की स्थिति में हुरबा, केदारचो, छिदो सारिंग, चांग सारिंग, रुतरंग, जरयो सारिंग, शौंग गांव, कुप्पा और बुआ सहित निचले क्षेत्रों को भारी नुक्सान होगा। इसके साथ ही इस तबाही की चपेट में क्षेत्र की दो प्रमुख जलविद्युत परियोजनाएं 300 मैगावाट की बास्पा-2 और 1,000 मैगावाट की कड़छम-वांगतू परियोजना भी आ सकती हैं, जिससे जानमाल के साथ-साथ भारी आर्थिक नुक्सान भी हो सकता है।
ड्रोन से निगरानी और पानी की नियंत्रित निकासी की मांग
संभावित तबाही को रोकने के लिए पंचायत ने प्रशासन के समक्ष कई अहम मांगें रखी हैं। प्रधान नेगी ने मांग की है कि भू-वैज्ञानिकों, सेना, आईटीबीपी और एसडीएमए की टीम द्वारा झील का तुरंत दोबारा निरीक्षण करवाया जाए। देबार कंडा और निचले गांवों में जल्द अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया जाए, ताकि आपदा के समय लोगों को अलर्ट मिल सके। इसके अलावा सांगला घाटी के लिए एक ठोस आपदा प्रबंधन और निकासी योजना तैयार की जाए। पंचायत ने यह भी सुझाव दिया है कि सैटेलाइट या ड्रोन के माध्यम से झील की 24 घंटे निगरानी की जाए और तकनीकी रूप से संभव हो, तो झील से पानी की नियंत्रित निकासी का प्रबंध किया जाए ताकि जलस्तर को कम रखा जा सके।
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