गुड़िया मामला : CBI जांच में फोरैंसिक साइंस निदेशालय की कार्यप्रणाली पर उठे ये सवाल

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Saturday, August 12, 2017-11:39 PM

शिमला: गुडिय़ा गैंगरेप, मर्डर केस में सी.बी.आई. जांच में और तेजी आ गई है। जांच में कइयों की पोल खुल रही है। पूरा सिस्टम बेनकाब हो रहा है। इससे पुलिस ही नहीं अब फोरैंसिक साइंस निदेशालय की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। सी.बी.आई. सूत्रों के अनुसार गुडिय़ा के साथ दरिंदगी दांदी के जंगल में उसी के आसपास हुई। मौत से पूर्व पीठ पर लगे निशान पूरी कहानी बयां कर रहे हैं। यानी गैंगरेप, मर्डर घर में नहीं हुआ। न ही उसे मर्डर के बाद दांदी जंगल में फैंका गया।

पहले मुंह दबाकर बेहोश किया और फिर रेप किया
दरिंदों ने पहले गुडिय़ा का मुंह दबाया, उसे बेहोश किया, फिर रेप किया। दरिंदगी के दौरान वह नहीं चिल्ला सकी। इस बीच 2-3 व्यक्तियों ने उसके शरीर पर दांत मारे। बाद में दम घुटने से उसकी निर्मम मौत हो गई। छात्रा की मौत का बेशक कोई व्यक्ति गवाह नहीं बना हो लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट सबसे बड़ी गवाह है। सैंपल बाकायदा एफ.टी.ए. कार्ड में उठाए गए हैं। फोरैंसिक विशेषज्ञों की मानें तो वहां से ये सैंपल 100 साल तक भी नष्ट नहीं हो सकते हैं। इसी के आधार पर सी.बी.आई. अपनी जांच को आगे बढ़ा रही है। 

डैड बॉडी बैग से नहीं ढका गया गुडिय़ा का शरीर
सिस्टम देखिए कितना संवेदनहीन बना रहा। पुलिस ने मौके पर पहुंचने में कई घंटे लगाए। फोरैंसिक साइंस निदेशालय तो उससे भी एक कदम आगे बढ़ गया। सूत्रों की मानें तो निदेशालय ने सीन ऑफ क्राइम पर अपनी पूरी टीम नहीं भेजी थी। अपराध स्थल पर न तो गुडिय़ा के नग्र शरीर को डैड बॉडी बैग से ढका गया और न ही सिर, बाजू पर कवर चढ़ाए गए। शव को सिर्फ एक सफेद कफन से ही ढका गया। मौके से कोई भी सैंपल एकत्र नहीं किए। न फोरैंसिक डिवीजन पहुंची और न ही उचित फोटोग्राफी की गई।

कातिलों के खिलाफ मिल सकते थे और पुख्ता सबूत 
 अगर पूरी टीम दांदी जाती तो कातिलों के खिलाफ और पुख्ता सबूत मिल सकते थे। अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट ही मौत का अकेला वैज्ञानिक सबूत है, जिसके सहारे जांच एजैंसी कातिलों तक पहुंच रही है। सूत्रों के मुताबिक छात्रा ने मौत से करीब 2 घंटे पूर्व चावल खाए थे। इसके साथ पीली दाल थी या फिर कड़ी, इसका खुलासा नहीं हो पाया है लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसका साफ तौर पर जिक्र किया गया है। 

डैड बॉडी बैग का नहीं होता है इस्तेमाल : निदेशक
जुन्गा स्थित फोरैंसिक साइंस निदेशालय के निदेशक अरुण शर्मा का कहना है कि पुलिस के साथ तालमेल की कमी जरूर रही लेकिन डैड बॉडी बैग का पूरे भारत में कहीं भी इस्तेमाल नहीं होता है। शव को नॉर्मल कपड़ों में बांधकर पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल पहुंचाया जाता है। उन्होंने बताया कि दांदी के लिए हमारे 2 लोग गए थे। इनमें एक तो सहायक निदेशक रैंक का अधिकारी था। शव पर बार-बार फ्लाइज बैठ रही थीं। सीन ऑफ क्राइम से एवीडैंस नष्ट नहीं हुए हैं। यह केस मासूम 4 वर्षीय युग की तरह ब्लाइंड नहीं है। इसके एवीडैंस उपलब्ध हैं, इसके दम पर आरोपियों तक पहुंचना आसान है। अभी सी.बी.आई. को रिपोर्ट नहीं दी जा सकी है। 

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