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गरीब परिवार की दास्तां, न रोजगार न ही घर में दरवाजा

  • गरीब परिवार की दास्तां, न रोजगार न ही घर में दरवाजा
You Are HereHimachal Pradesh
Sunday, January 21, 2018-4:17 PM

ऊना (सुरेन्द्र): गरीबों के उत्थान की बात तो देश में आजादी के बाद से ही शुरू हो गई थी। न जाने आजादी के बाद कितनी योजनाएं बनीं लेकिन इनसे कितने गरीबों का उत्थान हुआ यह तो तब पता चलता है, जब कोई जमीनी हकीकत देखे। कई सरकारें आईं और चली गईं लेकिन कुछ लोगों की किस्मत नहीं बदली है। आज भी यदि धन के अभाव में कोई व्यक्ति बिजली न लगा पाए, अपने एक कमरे के कच्चे घर में दरवाजा लगा पाने की हिम्मत भी न जुटा पाए और जिसकी छत बारिश में टपकती हो तो इसे क्या कहा जाए। गरीबी की इंतहा है कि एक व्यक्ति तिल-तिल अपना जीवन मुश्किल से निकाल रहा है। न उसके पास कोई स्थायी रोजगार है, न खेतीबाड़ी के लिए जमीन है और न ही कोई अन्य साधन जिससे वह जीवनयापन कर पाए। ऐसी घोर गरीबी कि 2 वक्त की रोटी भी मुश्किल से नसीब होती है।
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दरवाजे के स्थान पर चारपाई लगानी पड़ती है
उपमंडल अम्ब के तहत ग्राम पंचायत भद्रकाली के गांव फतेहपुर का कर्म चंद पुत्र गुरदास राम अभी भी इस इंतजार में है कि कोई उस पर तरस खाए और उसे रोजी-रोटी का कोई इंतजाम हो। जब परिवार मजदूरी के लिए बाहर जाता है तो दरवाजे के स्थान पर चारपाई लगानी पड़ती है। मजबूरी यह कि जो कच्चा मकान उसके पास है, उसमें अभी तक दरवाजा लगाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई है। आर्थिक बदहाली देखिए कि एक कमरे में 2 बच्चों सहित कर्म चंद और उसकी पत्नी रहते हैं। जिस कमरे में रहते हैं उस पर स्लेट तो हैं परंतु बारिश में पूरी छत टपकती है।
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गरीबी की वजह से बच्चे शिक्षा नहीं ले पाए
तंगहाली ऐसी कि कर्म चंद के घर देश की आजादी के बाद बिजली भी नहीं लग पाई है। बिजली का कनैक्शन लेने के लिए उसके पास पैसे तक नहीं हैं। 2 बच्चे हैं लेकिन गरीबी की वजह से शिक्षा नहीं ले पाए हैं। कुपोषण के चलते उनकी भी हालत खराब है। दलित कर्म चंद को 2007 में बी.पी.एल. में तो शामिल किया गया था परंतु उसे घर बनाने के लिए कोई भी मदद नहीं मिल पाई है। किसी प्रकार की आॢथक मदद न मिलने की वजह से कर्म चंद न तो अपना रोजगार शुरू कर पाया है और न ही इस स्थिति में है कि कोई कामधंधा चला पाए। मुश्किल से दिहाड़ी लगाकर 4 लोगों के लिए रोटी का जुगाड़ कर पा रहा है। कभी उसे भूखे भी रहना पड़ रहा है।
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