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यहां हर पत्थर, तालाब व मंदिर का आपस में है गहरा नाता

  • यहां हर पत्थर, तालाब व मंदिर का आपस में है गहरा नाता
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Wednesday, February 14, 2018-8:48 PM

कुल्लू: देवधरा पर कहीं कोई पत्थर दिखे या कहीं कोई तालाब नजर आए तो समझ लीजिए यह कोई आम पत्थर या जलाशय नहीं है। यहां हर पत्थर, हर तालाब और मंदिर का आपस में गहरा नाता है। कई जगह देव निशान के तौर पर ऐसी चट्टानें हैं, जिन पर किसी भी तरह की अशुद्धि का असर मीलों दूर स्थित किसी मंदिर में देखा जा सकता है। धरोहर गांव नग्गर के समीप झीड़ी नामक स्थान पर आज भी बाबा फुहारी का मंदिर विद्यमान है। इस मंदिर में हर रोज पूजा-अर्चना हो रही है। इस मंदिर के प्रांगण में जलाशय भी है, जिसे तीर्थ माना जाता है। खास मौकों पर लोग यहां पवित्र स्नान के लिए पहुंचते हैं और देवी-देवता भी तीर्थ स्नान के लिए झीड़ी आते हैं। लोग बताते हैं कि बाबा फुहारी के कहने पर ही अयोध्या से अधिष्ठाता रघुनाथ जी को 1648 में कुल्लू लाया गया था। 

ब्रह्म हत्या के दोष के बाद राजा जगत सिंह को हुआ था चर्म रोग
दरअसल जब ब्रह्म हत्या के दोष के बाद राजा जगत सिंह चर्म रोग से पीड़ित थे तो कई देवी-देवताओं के मंदिरों में जाकर उन्होंने इस रोग के उपचार के बारे में पूछा। कहीं से कोई सकारात्मक सुझाव नहीं मिला तो राजा परेशान हो उठे। इस बीच राजा जगत सिंह की मुलाकात बाबा फुहारी से हुई। बाबा फुहारी ने राजा जगत सिंह को अयोध्या से भगवान श्रीराम की मूॢत को कुल्लू लाने की सलाह देते हुए कहा कि मूर्ति स्नान के बाद चरणामृत ग्रहण करने से रोग से मुक्ति मिलेगी। बाबा फुहारी की सलाह पर ही राजा अयोध्या से रघुनाथ जी की त्रेता युग कालीन मूर्ति को कुल्लू लाए और उसके पश्चात ही रोग से मुक्ति भी मिल गई। इस प्रकार झीड़ी के जंगल में स्थित बाबा फुहारी के इस मंदिर का रघुनाथ जी के मंदिर और अयोध्या से सीधा नाता जुड़ गया है।

पवित्र स्नान के लिए नग्गर से मणिकर्ण जाते थे बाबा फुहारी
ग्रामीण बताते हैं कि बाबा फुहारी हर रोज पवित्र स्नान के लिए नग्गर से मणिकर्ण जाते थे। वह सूक्ष्म रूप धारण कर एक विशेष रास्ते का इस्तेमाल करते हुए मणिकर्ण पहुंचते थे। जिस रास्ते से वह आते-जाते थे, उस सुरंग रूपी रास्ते का मुहाना आज भी मंदिर के समीप मौजूद है। देवधरा पर ऐसे कई और दैवीय शक्तियों के प्रतीक हैं, जिनके समक्ष आते-जाते समय लोग नतमस्तक होते हैं। 

मीलों दूर दिखता है गतिविधि का असर
कुल्लू के देव कारकूनों ओम प्रकाश, चुनी लाल आचार्य, नानक चंद नेगी, मणिकर्ण से पुजारी नरेंद्र कुमार व नग्गर से बाबा फुहारी मंदिर के पुजारी हरबंस शर्मा ने कहा कि कुल्लू के जंगलों, पहाड़ों व अन्य कई जगहों पर कई ऐसी चट्टानें हैं, जिन पर किसी भी तरह की गतिविधि का असर सीधा किसी मंदिर में दिखता है। ये स्थान देवता से जुड़े हैं और इन स्थानों पर किसी भी प्रकार की अशुद्धि पर मीलों दूर मंदिर में किसी न किसी रूप में इसका असर दिखता है। उसके बाद देवी-देवता इसके उपाय के आदेश देते हैं। 

इसी जलाशय के पानी से करना होता है स्नान
पुजारी हरबंस शर्मा बताते हैं कि जब भी सुबह बाबा फुहारी के मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए जाते हैं तो घर से स्नान करके मंदिर जाने की मनाही है। मंदिर में जाकर वहीं के जलाशय के पानी से स्नान करने के बाद ही बाबा फु हारी की पूजा की जाती है। ऐसा सदियों से चला आ रहा है। इस मंदिर में नियम है कि पुजारी को यहीं के पानी से स्नान करके पूजा-अर्चना करनी पड़ती है। 

4 वर्ष पहले हुआ कारी छिद्रा महायज्ञ
कुल्लू के राज परिवार पर ब्रह्म हत्या के दोष को लेकर 4 वर्ष पूर्व कारी छिद्रा नामक महायज्ञ का आयोजन पार्वती घाटी के टीपरी गांव में किया गया था। इस महायज्ञ में पुरोहितों ने अरणी मंथन से हवन कुंड में अग्नि प्रज्वलित की थी। करीब पौने 400 वर्ष पूर्व दुर्गादत्त नामक ब्राह्मण ने अपने पूरे परिवार को घर में बंद करके घर को आग लगा दी थी। इस प्रकार कुल्लू के राजा पर ब्रह्म हत्या का दोष चढ़ गया था। इसी दोष का करीब 4 वर्ष पूर्व कारी छिद्रा महायज्ञ के जरिए निवारण करवाया गया। 


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