300 साल की परंपरा, मुस्लिम परिवार की पूजा के बगैर शुरू नहीं होता मिंजर मेला

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Monday, July 17, 2017-2:33 PM

चंबा: हिमाचल मेलों और त्यौहारों का राज्य है। यहां पूरे साल में कोई न कोई त्यौहार या मेला चलता ही रहता है, लेकिन चंबा का मिंजर मेला इन सब त्यौहारों और मेलों से अलग माना जाता है। क्योंकि यह सैकड़ों सालों से हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बना हुआ है।


300 वर्ष बीत जाने के बाद परंपरा कायम
लगभग 300 वर्ष बीत जाने के बाद भी यह परंपरा बनी हुई है। मिंजर मेला की शुरूआत चंबा के मुस्लिम समुदाय से सबंध रखने वाले मिर्जा परिवार के मुखिया रघुवीर जी द्वारा पूजा-अर्चना के साथ की जाती है। प्राचीन कहानियों के अनुसार दिल्ली के शासक शाहजहां द्वारा 17वीं शताब्दी में एक प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था, जिसमें चंबा के राजा पृथ्वी सिंह भी हिस्सा लेने पहुंचे थे। इस प्रतियोगिता में विजयी रहने पर चंबा के राजा द्वारा शाहजहां से भगवान रघुवीर को उनसे मांग लिया था जिसे दिल्ली के शासक द्वारा उन्हें भेंट किया गया था।



हर वर्ष मिंजर आते ही परिवार के सदस्य कार्य में जुट जाते हैं
जब चंबा के राजा भगवान रघुवीर को लेकर यहां आए तो उनके साथ सफी बेग मिर्जा भी पहुंचे। यहां पहुंचने पर सफी बेग ने रघुवीर को जरी गोटे से बनी मिंजर भेंट की, तब से आज तक लगभग 300 वर्ष हो चुके हैं लेकिन इस परिवार द्वारा मिंजर अर्पित करने के बाद ही इस मेले का आरम्भ हुआ, तब से यह प्रथा जैसी के तैसी चली हुई है। हर वर्ष जब मिंजर आती है तो इस परिवार के सदस्य मिंजर बनाने के कार्य में जुट जाते हैं। आज इस परिवार की 3 पीढ़ियां कार्य कर रही है। इसने द्वारा बनाई गई मिंजर ही मेले के दौरान बाजार में बिकती है। जिसे बहनों द्वारा अपने भाइयों की रक्षा व सुख समृद्धि के लिए बांधा जाता है। 

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